Monday, 10 March 2014


कभी हम आईने के सामने घंटो खड़े खुद को देख  मुस्कराते थे 
अब हम  आईने से मुह छुपाकर निकल जाते है 
कभी हम जिन्हे पास बिठाकर घंटो दुनिया का चलन सिखाते थे 
अब वो हमे नये जमाने की बाते चलते चलते समझाकर चले  जाते है 
अब होता है एहसास कि अब तेज है समय की रफ्तार 
और ज्यादा नही चल पाएंगे जमाने के साथ 
शायद इसी को बुढ़ापा कहते है