कभी हम आईने के सामने घंटो खड़े खुद को देख मुस्कराते थे
अब हम आईने से मुह छुपाकर निकल जाते है
कभी हम जिन्हे पास बिठाकर घंटो दुनिया का चलन सिखाते थे
अब वो हमे नये जमाने की बाते चलते चलते समझाकर चले जाते है
अब होता है एहसास कि अब तेज है समय की रफ्तार
और ज्यादा नही चल पाएंगे जमाने के साथ
शायद इसी को बुढ़ापा कहते है